हम 60 प्लस सखियों का एक ग्रुप है । हम लोग 20-25 साल से साथ हैं और जिंदगी का सफर भी जवानी से बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहा है। ग्रुप घूमने फिरने का काफी शौकीन है। साल में एक या दो बार हम लोग  घूमने के लिए निकलते ही हैं. फिर  चाहे 15 से 20 दिन के लिए जाएं या फिर 1 दिन का ही क्यों ना हो।  घूमने के प्रति लगाव बढ़ता ही जा रहा है ।

चलिए आपको अपनी एक यात्रा पर लिए चलते हैं। हाल ही में यानी  29 जून   को सिद्धवट कुटकी (जोकि दिगंबर जैन मंदिर है) यात्रा की। ओंकारेश्वर से यह थोड़ा आगे है, इंदौर से यह मंदिर 80 से 90 किलोमीटर की दूरी पर है। हाईवे से अंदर जंगल में से होते हुए सीधे मंदिर की ओर यह रास्ता जाता है।

बारिश का बेहद सुहावना मौसम  ऊपर आसमान में पानी से भरे बादल और धरा पर हरियाली ही हरियाली का वातावरण। हरे भरे पेड़ पौधे पानी से भीगे हुए, मानो आपके  आपका वेलकम कर रहे हैं।  प्रकृति की इस निराली छटा को शब्दों में  बयान नहीं कर सकते, सिर्फ महसूस कर सकते हैं।

क्योंकि हमें नाश्ता वहीं पर  करना था, तो हमें इंदौर से जल्दी निकलना था। हम सब इंदौर में एक जगह एकत्रित हुए हमारी जर्नी बाय रोड सुबह सात बजे से शुरू होने वाली थी। हमने कार हायर की हुई थी। हमने अपने साथ छुटपुट खाने का सामान रखा था , छाते , पीने का पानी और एक- एक ड्रेस रख लिया था।

सब खिलखिलाते, प्रकृति को निहारते, बतियाते, गाते और  बीच-बीच जोक्स मारते हुए अपने मंजिल की ओर बढ़ रहे थे, मानो  बचपन की और लौट रहे थे बड़ी ही बेफिक्री के साथ और मस्ती के साथ।

रास्ता जरूर खराब था पर कोई दिक्कत नहीं आई, तो पहुंच गए तीन से साढ़े तीन  घंटे में अपनी मंजिल पर।  सिद्धवरकूट रेवा नदी के किनारे बसा है।

अब पूरा परिसर मेरी नजरों से देखते हैं, लाल व सफेद पत्थरों से बना बड़ा ही सुंदर मंदिर , थोड़ी सी सीढ़ियां चढ़कर जाने पर मंदिर का कार्यालय बना है। एकदम शांत वातावरण है। कार्यालय में जाकर हमने अपने लिए एक रूम बुक करवाया, । रूम में 2 टेबल, एक कुर्सी , एक अलमारी एक डबल बेड और एक ड्रेसिंग टेबल । अलमारी में एक्स्ट्रा गद्दे चादरे और तकिए रखे थे। वॉशरूम भी काफी बड़ा और साफ सुथरा था।

यहां पर कई एसी और नॉन एसी रूम बने हुए हैं, धर्मशाला है, साधु संतों और साथियों साध्वी यो को अलग से रुकने की भी व्यवस्था है। इसी परिसर में बहुत ही साफ-सुथरी भोजनशाला है जहां पर पीने के पानी की व्यवस्था है भोजन पूर्णता शाकाहारी है और बहुत ही कम दामों में उपलब्ध है।यहीं पर हम चाय और पोहे का नाश्ता करते हैं।

इसी प्रांगण में पुरुषों के लिए पूजा करते समय पहने जाने वाले वस्त्र भी दिए जाते हैं और व्हीलचेयर की भी व्यवस्था है। यहां के अधिकारी के द्वारा  हमें एक हिदायत यह भी दी जाती है कि ज्यादा शोर शराबा नहीं होना चाहिए और  पत्ते या तंबोला जैसे गेम खेलने के लिए परमिशन नहीं  हैं।

अब चलते हैं मंदिर की ओर मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ा सा घंटा लगा है, ठीक उसके सामने एक स्तंभ बना है और इसी स्तंभ के सामने एक सुंदर सा फूलों का बगीचा है ,इस बगीचे में आप फोटो शूट कर सकते हैं।

यहां पर शंभू नाथ भगवान जी, पार्श्वनाथ भगवान जी, चंद्रप्रभु भगवान जी, क्षेत्रपाल जी (जो छेत्र की रक्षा करते हैं) और महावीर स्वामी जी की मूर्ति है जहां पर आप अभिषेक भी कर सकते हैं। यह सब अति प्राचीन मूर्तियां , है जोकि पहाड़ियों की खुदाई में मिली है. इनमें से कई मूर्तियां स्वयंभू हैं. ऐसा पुजारी जी बताते हैं, साथ ही यह भी बताते हैं कि यहां ऐसी चमत्कारी मूर्ति है जिसे सुबह देखने पर वह मूर्ति का चेहरा बाल्यावस्था वाला दिखाई देता है और रात में देखने पर उसी मूर्ति का चेहरा वृद्धावस्था में दिखाई देता है. एक मूर्ति की यह भी विशेषता है (यहां आपको बिल्कुल शांति बनाए रखना है) और ध्यान की अवस्था में जाना है खुली आंखों से आपको ध्यान लगाकर मूर्ति की ओर निहारना है, तो आपको मूर्ति का रंग बदलते हुए दिखेगा यह वाकई हमने सब ने देखा और महसूस किया हम सब रोमांचित हो उठे.

यहां दर्शन करने के बाद आगे थोड़ा सा चलकर जाने पर सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना होता है जहां पर आदिनाथ भगवान की सबसे प्राचीन मूर्ति विराजित है, हम सब इस मूर्ति को नमन करते हैं।अब दर्शन के बाद और ऊपर से जो नजारे दिखते हैं वह अति सुंदर है मंदिर चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है, यहीं से दो नदियों का संगम और ओंकारेश्वर मंदिर भी दिखाई देता है।

यहां एकदम शांति है, जो आपको मंत्रमुग्ध कर देती है इसी छत पर से जब हम नीचे की ओर देखते हैं तो हमें कई और मंदिर दिखाई देते हैं घंटियों की मधुर आवाज गूंजती रहती है, अन्य तीर्थयात्री भी आपको दिखाई देते रहते हैं , पक्षियों की चहचहाहट और कई तरह के पक्षी आपको दिखाई देते हैं, ऐसा लगता है कि आनंद के सागर में हम गोते लगा रहे हैं।

अब भोजन का समय हो गया है सुस्वादु भोजन का हम सब आनंद लेते हैं फिर रेस्ट करने के लिए रूम पर जाते हैं। रेस्ट के बाद हम फोटोग्राफी करते हैं। अब प्रभु से जाने की आज्ञा लेते हैं और चल पड़ते हैं इंदौर के लिए यहीं पर एक दो और दर्शनीय स्थान है जिन्हें हम देखते हैं और इस यात्रा की सुंदर और मधुर यादों को अपने मन में मस्तिष्क में रखते हुए मुस्कुराते हुए निकल पड़ते हैं अपने गंतव्य की ओर।

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