राजीव सक्सेना,

पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन, कला – फ़िल्म समीक्षा, सिने – टीवी  पटकथा लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में तीन दशक से सक्रिय हैं.जयपुर में निवास

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कर लो दुनिया मुट्ठी में, के नारे ने परदेस में कोई खास असर डाला हो.. न डाला हो..आम भारतीय को खासा एडिक्ट बनाने में कसर तो नहीं छोड़ी.दिन के हर पहर में देश के हर कोने में चलते – फिरते, सोते – जागते-नहाते – धोते भी..फोन का बेजा इस्तेमाल. नशे की ऐसी लत जो छुड़ाए नहीं छूटती.ऊपर से..करेला और नीम चढ़ा..की कहावत को सार्थक करते हुए इसी के ज़रिये सोशल मीडिया की एक और बुरी लत बची-खुची ज़िन्दगी के पलों पर भी काबिज हो गई गोया कि,आजादी के पचहत्तर साल बाद बाणिया दिमाग़ ने जन जीवन को गुलामी में जकड़ लिया.

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी…वो बचपन के खेल… दादी – नानी से सुनी कहानी…वो लाल रंग का पोस्ट बॉक्स… वो.. डाकिये की सायकल की घंटी और… उसके हाथ से लिफाफे को लगभग छीनने का अनूठा सुख..लिफाफा खोलकर उसके भीतर से निकली प्यार भरी इबारत की सौंधी सुगंध वाली..चिट्ठियां…सब कुछ… अब ऐसे ख़ो गए कि सपनों तक मेँ दिखाई नहीं देते.

कभी देर रात एफ एम रेडियो को सर्च कीजिये सत्तर -अस्सी के दशक के आल इंडिया रेडिओ, विविध भारती या रेडिओ सीलोन की याद आ जाएगी..

रात की तन्हाई के साथी बने गीत .. जैसे  रिवर्स गियर के चलते ज़िन्दगी के फ़्लैशबैक में ‘ नोस्टेलजिया ‘ से रु ब रु कराने लगते हैं.बिना किसी ब्रेक, विज्ञापन या होस्टिंग के एक के बाद एक गाने.दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी..काहे को दुनिया बनाई..

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन बचपन के दिन भुला ना देना.देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान.. हर एक गाना जैसे सालों पीछे खींच कर ले जा रहा था..

पंडित प्रदीप के अपने एक अलग अंदाज़ वाले गीत ‘देख तेरे संसार.. ‘ ने एक अजब जिज्ञासा पैदा कर दी.

तकरीबन 50 के दशक की होगी फ़िल्म ‘नास्तिक’ जिसमें ये गीत रखा गया था, यानि इंसान उस दौर में इतना बदल गया था..? जवाब ख़ुद ब ख़ुद सामने था, मोबाइल का नेट बैलेंस.. रात बारह बजे.. अगले दिन के डेढ़ जीबी प्लान में तब्दील हो गया था. बदलाव तो प्रकृति का नियम है, ये सच सामने आया.. हाथ में मोबाइल फ़ोन है तो फ़ोन  से ही  शुरू कीजिये ना..डाक घर में जाकर ट्रंक काल बुक करना … घंटों इंतज़ार…. खास ख़बर के लिए टेलीग्राम.. किसी रईस के घर पर वो घंटी वाला फोन होता होगा.. गोलाकार घूमता हुआ डेश बोर्ड जो एक डिजिट डायल करते वापस अपनी जगह आ जाता. भारी सा क्रेडल उठाकर बेहद शाइस्तगी से ‘हेलो’ बोलना.. ‘जी कौन साहब बोल रहे हैं, नाम जान सकते हैँ आपका?’

क्या -क्या बदला सब बताने की ज़रूरत नहीं..

अँधेरी, मुंबई के सात बांग्ला इलाके के पी सी ओ से अपने घर फ़ोन करने की नब्बे के दशक की,मेरी वो मशक्कत, फिल्मों – टीवी में काम ढूंढने वाले कलाकार  के संघर्ष से कतई कम नहीं रही होगी.ज़ेब का ख़याल रखते हुए ग्यारह बजे के एक चौथाई रैट पर बात करके, पैसे बचाकर  सुबह की चाय के साथ ‘बड़ा पाव’ की कल्पना करना.  कागज़ की कश्ती और बारिश के पानी का मज़ा..वही बयां कर सकता है, जिसने लिया होगा.. बचपन की शरारत वो बताएगा, जिसने की होगी.चौके में,  चूल्हे पर, तवे में सिकती, मां के हाथ की. ‘ममता के शुद्ध घी’ से चुपड़ी रोटी का स्वाद.. भुजिया आलू की वन एंड ओनली सब्ज़ी के साथ.

आज के रेस्टॉरेंटस में..पचास चीज़ों से भरी पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी थाली भी क्या देगी.. वो अनमोल स्वाद. घर के बने चावल के पापड़, आम का अचार, बेसन के लड्डू.. त्यौहारों पर अपनी – अपनी लोक संस्कृति की महक..पड़ोस का सुख..  अपनेपन का मीठा अहसास.. सच, हम मीलों दूर छोड़ आये हैं.     ख़ुश तो बहुत होंगे.. दुनिया जो हमारी मुट्ठी में है.. बटन दबाइये खाना हाजिर, टैक्सी हाजिर.. पांच सेकंड में पैसे ट्रांसफर. भावनाओं का क्या है वो भी तो मुट्ठी में हैं.. पढ़ाई की पुस्तक या कॉपी के भीतर प्रेमपत्र रखना..झुकी नज़रों का रफ़्ता – रफ़्ता ऊपर की और उठना.. ‘शिट, हाउ बोरिंग.. ‘ राजेन्द्र कुमार – सायरा बानो की इतनी लम्बी प्रेम कहानी की क्या ज़रूरत.. फेसबुक पर शुरू.. इसी पर ख़त्म.

लाल रंग के ‘पोस्ट बॉक्स’ संग्रहालय का पता पूछ रहे हैं,’पोस्टकार्ड’ को हैरत से देख बेटी पूछती है.. ‘व्हाट्स दिस..खुला -खुला हाउ बैकवर्ड यू आर ? व्हाट्सएप है ना..?

जहां रिश्ते रीसायकल हो जाएं ..बच्चे, पेरेंट्स को सिखाने लगें..वहां यक़ीनन याद आएंगे..

वो कागज़ की कश्ती.. वो बारिश का पानी..जगजीत सिंह की कशिश भरी आवाज़,ब क़लम सुदर्शन ‘फ़ाक़िर’.

1 Comment

  • Sadhana sharma, June 30, 2022 @ 8:19 am Reply

    Bahut sunder apne purane din yaad aa jate hai jo fir kabhi laut kar nahi aa sakte aaj technology itni develop ho gai but itni nahi hui ki ham apna bachpan wo khushi bhare din wapas de sake bahut dil ko chu lene wala column

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