अंजु श्रीवास्तव निगम

(साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन, देश के प्रमुख प्रकाशनों में रचनाओं का लगातार प्रकाशन, कई सम्मान व पुरस्कार प्राप्त, आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण, लखनऊ में निवासरत )

               लखनऊ की सरजमीं

लखनऊ की तासीर ही ऐसी है कि ये शहर बार-बार बुलाता है। इस शहर ने इतिहास के कई पन्नों को अपनी आँखों के सामने गुजरते देखा।

लखनऊ मेरी जन्म भूमि है, मात्र इसलिए ये लगाव गहरा नहीं है। बल्कि इस शहर को कण-कण जिया है और जानती हूँ कि ये शहर कण-कण जिदंगी जीता है।

लखनऊ उत्तरप्रदेश की राजधानी तो है ही, कई मायनों में यह शहर अपना एक अलग मुकाम हासिल रखता है। चाहे वह चिकनकारी हो, चाहे खान-पान या चाहे वह अदब-सलीका हो। चारबाग स्टेशन में जब भी उतरी, बेहिसाब भीड़ ने स्वागत किया पर हमेशा एक अपनेपन का गुलाल आकर चेहरे पर बिखर ही गया।पुरातात्विक महत्व की इमारतों ने इतिहास को जीवित रखा है। चाहे वह बड़ा इमामबाड़ा है, बड़े इमामबाड़े में ही बनी भूल-भुलैया हो, छोटा इमामबाड़ा हो, बेगम हजरत महल पार्क हो, रेसीडेंसी हो, बारादरी हो। उस वक्त का हर पन्ना यहाँ महफूज मिलेगा।

आप चौक की ओर निकल जाये और आपको वहाँ का माहौल अपने में न समेट ले, ऐसा मुमकिन नहीं। रामआसरे की दुकान की पान की गिलौरी, रसमलाई, मक्खन जो मुँह में रखो और घुल जाये। यहाँ की लजीज चाट-पकौड़ी का स्वाद बरसों जुबान में घुला रहता है। चाट -पकौड़ी तो गंज के चौधरी और अमीनाबाद की चाट वाली गली की भी प्रसिद्ध है। लखनऊ जैसी चाट मैंने और कहीं खाई भी नहीं। अमीनाबाद की ही “प्रकाश की कुल्फी” ने करीब चार दशकों से अपनी धसक बना रखी है।

अमीनाबाद के ही पास निकले तो नजीबाबाद के “टुंडे के कबाब” की नजाकत किसके मुँह में नहीं घुली होगी। ऐसा ही जबरदस्त  खाना, गंज के पास, तुलसी सिनेमा के पीछे, दस्तरख्वान में खाने को मिलेगा।  हलाकि परिवार के साथ बैठ कर खाने की जगह नहीं है और लोग खाना पैक करवा कर ही ले जाते है। तब भी यहाँ जबरदस्त भीड़ रहती है।

लखनऊ आये और चिकनकारी के सूट-साड़ी न ले तो सफर अधूरा सा लगता है। चौक और राजा बाज़ार में तो चिकनकारी की लाइन से कई दुकानें मिलेंगी ही, साथ ही गंज के पास जनपथ में भी चिकन के काम की काफी दुकानें मिल जायेगी। अंतर केवल पैसों और जगह का है ।

जब बात चौक की उठी है तो बताती चलूँ कि चौक में बने बड़े इमामबाड़े के सामने खड़े तांगों का एक सफर जरूर लें। लखनऊ के जिस अदब , लिहाज , लहजे , जु़बान में बैठी नजाकत की बात होती है , वह यहाँ के तांगे वालों की बोली में घुला है। आप इनकी जुबान के कायल हो जायेगे और अहसास भी लगेगा कि आपकी शख्सियत का वजूद कितना वजनदार है।

नयेपन की सौगात ने शहर की शान में एक और पंख लगा दिया है। मेट्रो सेवा से शहर की दूरियों में लगने वाले समय को कम करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। ये कितना कारगर रहता है ,ये वक्त बतायेगा।

गंगा-जमूनी तहजीब

गंगा-जमूनी तहजीब का शहर है लखनऊ। जहाँ हर धर्म के लोग खुल कर साँस ले पाते है। यहाँ हनुमान सेतु की पवित्र हवा बहती है तो चारबाग स्टेशन के एकदम पीछे बने खम्मन पीर की मजार की रूहानी तासीर भी मौजूद है। कहते है हनुमान सेतु के दरवाजें गया कोई भी व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं जाता और पीर बाबा की मजार की भी ऐसी ही मान्यता है। गुरुवार के दिन यहाँ खूब भीड़ उमड़ती है।  ये बताना लाजिमी सा लगता है कि आज भी लखनऊ के पुराने मोहल्ले में वही साझापन, आपसी सौहार्द देखने को मिलता है जो आज से साठ साल पहले हुआ करता था। ऐसे शहर के लिये गर्व करें तो अतिशियोक्ति नहीं होगी न!

1 Comment

  • अजीत सक्सेना, May 31, 2022 @ 1:29 pm Reply

    बेहतरीन, लाजबाव, लल्लन टाप लेखन , लखनऊआ शैली में तहज़ीब से सराबोर।
    बार बार पढ़ने को दिल चाहे। शुभकामनाएं।

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