लेखिका* अंजू श्रीवास्तव निगम

                     परिचय……

  • पिछले करीब पाँच साल से हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लगातार लेखन और प्रकाशन।
  • विधा –  लघुकथा, कहानी, कविता, गीत, गजल और संस्मरण।
  • प्रकाशन / प्रसारण – देश के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। दैनिक जागरण”,”इंदौर समाचार”,”वीणा”,”कलमकार”,”अद्भुत समाचार”,”दृष्टि”,”सत्य की मशाल”,”द राईजिंग स्टेप”,”न्यूज टुडे, लोकमत समाचार, समाज्ञा  स्टेप अहेड, उत्कर्ष एक्सप्रेस,हिंदी रक्षक मंच, हरियाणा प्रदीप,देवभूमि,पत्रिका, अमर उजाला के “रुपायन”, बंसत मालती में भी रचना प्रकाशन।
  • पुस्तक प्रकाशन –  कारवां, क्षितिज, प्रवाह ,”नदी चैतन्य, हिंद धन्य”(नदी अभियान का साझा संग्रह) ,राईजिंग स्टेप “लघुकथा संग्रह”,” काफिला”,”कारोना विशेषांक”,” लघुकथा कलश”,”साहित्य पीडिया काव्य संग्रह”,” सत्य की मशाल लघुकथा संग्रह”,”कलमकार लघुकथा संग्रह”एंव “कलमकार काव्य संग्रह” आदि साझा संग्रह में रचनाओं का प्रकाशन।
  • सहभागिता – अखिल भारतीय लघुकथा अधिवेशन, महिला साहित्य समागम (इंदौर) सहित अनेक साहित्यिक आयोजन में सहभागिता। सहभागिता पर सम्मान।
  • आकाशवाणी देहरादून से लघुकथा का पाठन एंव प्रसारण। इंदौर से तीन लघुकथा का प्रसारण।
  • सम्मान/पुरस्कार-  नदी अभियान में – यमुना सम्मान। वरिष्ठ लेखक व शिक्षक डॉ. एस. एन. तिवारी की स्मृति में साहित्य सम्मान।संस्कार भारती द्वारा आयोजित काव्य समारोह में काव्य पाठ एंव सम्मान। साहित्य पीडिया द्वारा प्रेषित काव्य संग्रह में मेरी कविता को स्थान,सम्मान एंव प्रशस्ति पत्र मिल चुका हैं। ‘हिंदी रक्षक मंच’ द्वारा आयोजित ‘अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता’ में मेरी लघुकथा को प्रथम स्थान। कुछ दिनों पहले स्टोरी मिरर की कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पंद्रह विजेताओं की सूची में स्थान। हाल ही में क्षितिज संस्था द्वारा “नवलेखन सम्मान” प्रदान किया गया।
  • सदस्य – वामा साहित्य मंच,  क्षितिज और विचार प्रवाह साहित्य मंच , इंदौर

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                             इस पहाड़ी स्थान में प्रकृति अपने संपूर्ण रंगो में मुखर है

हमें ट्रेन ने देहरादून से काठगोदाम सुबह 7.15 पर पहुँचा दिया। वहाँ से हम सीधे जागेश्वर के लिए रवाना हो गये जो काठगोदाम से 140 किलोमीटर दूर है। रास्ता बहुत खूबसूरत और सड़के एकदम दुरुस्त थी। रास्ते में रानीबारा, सलड़ी, भीमताल, खुटानी, महरागाँव, भवाली, कैंची,गरमपानी, धारानौला, चित्तई, पेटशाल, बाड़े छीना,पनवानौला, डंडेश्वर आदि गाँव पड़े। इसमें कैंची धाम में बाबा नीम करौली का प्रसिद्ध मंदिर है। इसकी काफी मान्यता है और दूर दूर से लोग यहाँ मंदिर में दर्शन करने आते हैं। यहाँ एक बात ने बहुत प्रभावित किया कि कारोना की महामारी के चलते सभी मंदिरों में मास्क पहनना अनिवार्य है। यहाँ के लोग भी इस विषय में जागरूक दिखे। कैंचीधाम के पास ही एक दुकान में मुंग के पकौड़े मिलते है जिसके लिए लोग विशेष तौर पर रुकते है।

भवाली गाँव में एक तरह का फल “काफल” जो “फालसे”की तरह होता है, बहुतायत से मिलता है। काठगोदाम से जागेश्वर के बीच सबसे ज्यादा आबादी वाला अल्मोड़ा शहर है। जो जागेश्वर से महज बाईस किलोमीटर दूर है। अल्मोड़ा के पास ही स्थित चित्तई गाँव में”गोलु देवता” के मंदिर की कुमाँऊ के पहाड़ों में बड़ी मान्यता है। यहाँ एक रोचक जानकारी जरूर प्रस्तुत करना चाहूँगी। इस मंदिर में भक्त अर्जी लगाकर जाते है। एक सादे  पेपर में अपनी इच्छा लिख कर और उसे कलावा से लपेट कर यहाँ बांध जाते है। इच्छा पूर्ण होने पर अर्जी निकाल लेते हैं और पूजा की चुन्नी में घंटी बांध कर यहाँ टाँगते है। छोटी से बड़ी हर तरह की घंटी भक्त अपनी इच्छा के अनुरूप चढ़ाते है। किसी ने बताया कि कभी कभी कोई भक्त, रेल में आरक्षण हो जाने तक की अर्जी यहाँ लिख कर टाँगते है। वहाँ बंधी असंख्य घंटियों की तस्वीर मन में एक अलग छाप छोड़ गयी।

जागेश्वर से कुछ पहले ही चीड़ के पेड़ो की जगह घने देवदार के पेड़ो ने मन मोह लिया। जागेश्वर एक तरह से देवदारों से ही घिरा है।यहाँ जागेश्वर जी जागृत रुप में विधमान है ,इन्हें स्वयंभू अर्धनारीश्वर के रुप में भी जाना जाता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में यहाँ के ज्योतिर्लिंग आठवें स्थान पर विराजित है। यहाँ के वृद्ध पंडित जी के अनुसार ज्योतिर्लिंग के समक्ष जल रही अखण्ड ज्योति सातंवी या आठवीं शताब्दी से प्रजवल्लित है। पहले इस ज्योति की लौ राजा दीपचंद्र के मुख तक प्रजवल्लित होती थी।बाद में यह नीचे खिसक कर उनकी नाभि तक आ गई। कहा जाता है कि जब यह ज्योति चरणों तक आयेगी तब प्रलय होगी और कलयुग का अंत होगा।

गर्भग्रह के बाहर दो द्वारपालों की प्रतिमा है।नंदी और भृंगी। इसके आगे गणेश जी प्रतिमा शोभायमान है। चुकिं इस प्रतिमा में गणेश जी की सूड़ उत्तर दिशा में है अतः इनको उत्तरमुखी कहा जाता है।

यहाँ ऐसा भी कहा जाता रहा है कि जटा गंगा जो मंदिर के पाँच किलोमीटर ऊपर से निकलती थी,उसमें से दूध की धारा प्रवाहित होती थी।जोगेश्वर मंदिर परिसर में एक सौ आठ शिवलिंग स्थापित है जो इस मंदिर की भव्यता और ओजस्विता को बढ़ाते है।जोगेश्वर के पास ही स्थित दाणेश्वर मंदिर के भी दर्शन किये।

            योगा रुम” ने सुखद अहसास से भर दिया

हम जिस रेस्ट हाउस में ठहरे थे,उससे एकदम अलग हट कर एक दूसरा रेस्ट हाउस था जिसकी कलात्मकता ने मुझे बेहद प्रभावित किया।”वन सराय” नाम का यह रेस्ट हाउस मौसम और स्वास्थ्य  को ध्यान में रखते हुये बनाया गया है। वैसे तो इस पहाड़ी स्थान में प्रकृति अपने संपूर्ण रंगो में मुखर है पर इस रेस्ट हाउस ने प्रकृति को आत्मसात कर नये तौर तरीकों से सुसज्जित किया है। यहाँ बने”योगा रुम” ने मुझे सुखद अहसास से भर दिया।  शिद्दत से अनुभव हुआ कि यहाँ के स्थानीय निवासी न केवल प्रकृति बल्कि अपने रीति-रिवाजों, संस्कारों के प्रति पूरी तरह से चैतन्य है।

कुल मिला कर जागेश्वर की मेरी यह यात्रा कई मायनों में सुखद रही। धर्म की महत्ता, प्रकृति का करिश्माई रुप, पहाड़ी लोगों का निश्चल व्यक्तित्व सभी ने मुझे गहराई से छुआ। अगली बार प्रकृति का यह सोंधापन फिर से आत्मसात कर पाँऊ, ऐसी इच्छा है।

( लेखिका नई दिल्ली में रहती हैं )

अगली बार नई यात्रा के बारे में………..

1 Comment

  • सुषमा व्यास "पारिजात", March 4, 2022 @ 11:25 am Reply

    बहुत सुन्दर यात्रा और उसका सुखद वृत्तांत पढ़कर वहाँ जाने की लालसा जाग गई।
    बहुत बहुत बधाई आपको 👌👌👍💐💐

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